Sunday, December 6, 2009

प्रभु के न्याय में दृढ़ श्रद्धा हो गई है - खलील ज़िब्रान



जब से मुझे पता चला है


कि मखमल के गद्दे पर सोने वालों के


सपने


नंगी ज़मीं पर सोने वालों के


सपनों से


अधिक मधुर नहीं होते,


तब से मुझे


प्रभु के न्याय में


दृढ़ श्रद्धा हो गई है



- खलील ज़िब्रान


2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आमीन!

जी.के. अवधिया said...

सुन्दर विचारों की श्रृंखला में एक और कड़ी!