Friday, December 11, 2009

धर्म जैसी चीज नहीं मिल सकती




लड़ाई-झगड़ा,


वाद-विवाद


और


होड़ा-होड़ी


करके


चाहे जो चीज


मिल जाए


पर धर्म


जैसी चीज नहीं मिल सकती


धर्म का दण्ड


माँ का मुँह नहीं देखता रहता



-शरचंद्र



3 comments:

निर्मला कपिला said...

सही बात है शुभकामनायें

जी.के. अवधिया said...

सुन्दर विचारों की श्रृंखला में एक और कड़ी!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कर्म और कर्तव्य ही तो,
भाग्य का निर्माण करते!
हीन हैं कर्तव्य से जो,
धर्म का वो दम्भ भरते!!